भारत संहिता

अध्याय ६

रोगानीकविमानम्

रोगों के भेद

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भूमिका

रोगानीकविमान चरक संहिता के विमानस्थान का छठा अध्याय है, जिसे हिन्दी शीर्षक में 'रोगों के भेद' कहा गया है। 'रोगानीक' का अर्थ है रोगों का वर्ग या समूह (रोग और अनीक), और 'विमान' का अर्थ है ठीक-ठीक माप या विशेष ज्ञान। इसका उपदेश भगवान् आत्रेय देते हैं। अध्याय का पहला प्रश्न यह है कि रोगों को किन आधारों पर वर्गों में बाँटा जाता है और उन वर्गों की गिनती कितनी मानी जाए।

आरम्भ में आत्रेय पाँच आधार बताते हैं, प्रभाव, बल, अधिष्ठान, निमित्त और आशय, और हर आधार पर रोग दो वर्गों में बँटते हैं: साध्य और असाध्य, मृदु और दारुण, मन में और शरीर में स्थित, अपने धातुओं की विषमता से और बाहरी कारण से होने वाले, आमाशय से और पक्वाशय से उठने वाले। वे यह भी कहते हैं कि जोड़कर देखें तो रोग एक है, क्योंकि दुःख सबमें समान है, और बाँटकर देखें तो अनेक, कभी गिने जा सकने वाले और कभी अनगिनत। फिर वे समझाते हैं कि अलग-अलग आधारों पर अलग-अलग गिनतियाँ आने से कोई कथन दोषपूर्ण नहीं होता, और 'रोग' जैसा एक ही शब्द दोषों के लिए भी आता है और व्याधियों के लिए भी, इसलिए प्रसंग देखकर अर्थ लेना चाहिए।

इसके बाद अध्याय दोषों की ओर आता है। व्याधियाँ बहुत अधिक होने से गिनी नहीं जा सकतीं, पर दोष गिने जा सकते हैं: मन के दो, रज और तम, और शरीर के तीन, वात, पित्त और कफ (श्लेष्मा)। दोषों के कुपित होने के तीन कारण बताए गए हैं: इन्द्रियों का अपने विषयों से असात्म्य संयोग, प्रज्ञापराध और परिणाम (काल)। कारणों और दूष्यों के भेद से विकार अगणित हो जाते हैं, और वे आपस में कभी-कभी जुड़ भी जाते हैं; रज और तम का जुड़ाव सदा रहता है, जबकि शरीर के दोषों का मेल सन्निपात (तीनों का) या संसर्ग (दो का) कहलाता है। जो दोष या रोग प्रधान और स्वतन्त्र हो उसे अनुबन्ध्य, और उसके पीछे लगे हुए को अनुबन्ध कहा गया है।

फिर अध्याय शरीर की अग्नि के चार भेद, तीक्ष्ण, मन्द, सम और विषम, बताकर उन्हें चार प्रकार के मनुष्यों से जोड़ता है। यहाँ एक मत रखा जाता है कि मनुष्य विषम आहार लेते हैं, इसलिए किसी में दोष सम नहीं रहते, और ग्रन्थ इसका खण्डन करता है: आरोग्य ही प्रकृति है, इसलिए सम दोषों वाले मनुष्य होते हैं, और वातल, पित्तल, श्लेष्मल मनुष्य अपनी प्रकृति में स्थित नहीं माने जाने चाहिए। इन तीनों के लिए ग्रन्थ बताता है कि उनका अपना दोष किन बातों के सेवन से शीघ्र कुपित होता है और उसे जीतने के लिए कौन-से उपाय गिनाए गए हैं। यह ग्रन्थ का वर्णन है, कोई चिकित्सा-सलाह नहीं।

अन्त में एक श्लोक कहता है कि जो सब रोगों के भेद, सब कार्यों के भेद और सब भेषजों का तत्त्व जानता है, वही राजा का प्राणपति होने योग्य वैद्य है, और संग्रह-श्लोक अध्याय के विषय गिनाते हैं। अध्याय से साथ ले जाने योग्य बात यह है कि रोगों की गिनती उस आधार पर टिकी है जिससे उन्हें बाँटा जाए, इसलिए वर्गीकरण और नाम दोनों को प्रसंग के साथ समझना चाहिए।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक २०-२२)

तत्र श्लोकाः-प्रकृत्यन्तरभेदेन रोगानीकविकल्पनम्।परस्पराविरोधश्च सामान्यं रोगदोषयोः॥

श्लोक २० →

इस विषय में (संग्रह के) श्लोक (ये हैं): अलग-अलग आधारों पर किए गए भेद से रोगानीक (रोगों के वर्गों) का विकल्पन (वर्गीकरण), और (उनका) परस्पर अविरोध (एक-दूसरे से विरोध न होना), रोग और दोष का सामान्य (समानता),

दोषसंख्या विकाराणामेकदेशः प्रकोपणम्।जरणं प्रति चिन्ता च कायाग्नेर्धुक्षणानि च॥

श्लोक २१ →

दोषों की संख्या, विकारों का एकदेश (एक अंश), प्रकोपण (दोषों को प्रकुपित करने वाले कारण), और जरण (पाचन) के विषय में चिन्ता (विचार), और कायाग्नि (शरीर की अग्नि) के धुक्षण (उसे प्रदीप्त करने के उपाय),

नराणां वातलादीनां प्रकृतिस्थापनानि च।रोगानीके विमानेऽस्मिन् व्याहृतानि महर्षिणा॥

श्लोक २२ →

और वातल आदि मनुष्यों के प्रकृतिस्थापन (उन्हें प्रकृति में स्थापित करने के उपाय), (ये सब) इस रोगानीक विमान में महर्षि ने कहे हैं।

मुख्य शब्द (२१) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

धातु
धातु - शरीर को धारण करने वाले घटक
विस्तार

शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।

अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।

चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।

व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।

विशेष
विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

विकार
विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

रजस्
रज - मन का एक दोष; चंचलता और उत्तेजना
विस्तार

अर्थ: सांख्य दर्शन में रज प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) में से एक है - गति और उत्तेजना का गुण। सामान्य अर्थ 'धूल' भी है।

चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)। रज के बढ़ने के लक्षण आगे के अध्यायों में आते हैं।

तमस्
तम - मन का एक दोष; जड़ता और अज्ञान
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अन्धकार' है। सांख्य दर्शन में तम प्रकृति के तीन गुणों में से एक है - जड़ता और आवरण का गुण।

चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)।

वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार

शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

इन्द्रिय
इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।

अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।

चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।

गुण
गुण - द्रव्य की विशेषता, जैसे भारी, ठण्डा
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।

चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।

सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।

लिङ्ग
लिङ्ग - चिह्न; रोग या स्वास्थ्य का लक्षण
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।

व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।

भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

आरोग्य
आरोग्य - रोग का न होना; स्वास्थ्य
विस्तार

शब्द-रचना: अ (नहीं) + रोग + य (भाव)।

अर्थ: रोग से रहित होने की अवस्था, अर्थात् स्वास्थ्य।

चरक संहिता में: आरोग्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - जीवन के चारों लक्ष्यों - का उत्तम मूल है (सू. १/१५); रोग इसी को हर लेते हैं (सू. १/१६)।

भेषज
भेषज - औषध, उपचार
विस्तार

शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।

अर्थ: औषध, उपचार।

चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।

आतुर
आतुर - रोगी
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।

चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।

आयुस्
आयु - जीवन; शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा का संयोग
विस्तार

अर्थ: जीवन, और वह अवधि जितनी जीवन चलता है।

चरक संहिता में: आयु शरीर, इन्द्रिय, सत्त्व (मन) और आत्मा का संयोग है - जब तक ये चारों जुड़े हैं, तब तक जीवन है (सू. १/४२)। इसके पर्याय भी दिए गए हैं: धारि, जीवित, नित्यग और अनुबन्ध।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार

शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

औषध
औषध - दवा; रोग दूर करने का साधन
विस्तार

शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।

अर्थ: रोग दूर करने का साधन।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।

मारुत
मारुत - वात दोष का दूसरा नाम
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा, पवन' (और वायु-देवता) है।

चरक संहिता में: मारुत वात दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/५९)। गुण और चिकित्सा के लिए 'वात' देखें।

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च. वि. ६/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम रोगानीक (रोगों के वर्गों सम्बन्धी) विमान की व्याख्या करेंगे।

च. वि. ६/२

॥ २ ॥

ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. वि. ६/३

; ; ; ; । । ; ; । ॥ ३ ॥

प्रभाव के भेद से रोगानीक (रोगों के वर्ग) दो होते हैं: साध्य और असाध्य; बल के भेद से दो रोगानीक: मृदु और दारुण; अधिष्ठान (आश्रय) के भेद से दो रोगानीक: मन में स्थित और शरीर में स्थित; निमित्त (कारण) के भेद से दो रोगानीक: अपने धातुओं की विषमता के कारण होने वाला और आगन्तु (बाहरी) कारण से होने वाला; आशय के भेद से दो रोगानीक: आमाशय से उत्पन्न और पक्वाशय से उत्पन्न। इस प्रकार प्रभाव, बल, अधिष्ठान, निमित्त और आशय के भेद से दो प्रकार का होता हुआ यह (रोगानीक), विभाजन के किसी दूसरे आधार से बाँटे जाने पर, अथवा फिर जोड़े जाने पर, एक (एकत्व) या अनेक (बहुत्व) हो सकता है। एकत्व (की दृष्टि से) तो रोगानीक एक ही है, क्योंकि दुःख (सब रोगों में) समान है; परन्तु बहुत्व (की दृष्टि से) प्रभाव के भेद आदि से दस रोगानीक होते हैं; बहुत्व भी संख्येय (गिना जा सकने वाला) हो सकता है या असंख्येय (अनगिनत)। उनमें संख्येय (बहुत्व) तो वैसा है जैसा अष्टोदरीय (अध्याय) में कहा गया है, और अपरिसंख्येय (बहुत्व) वैसा है जैसा महारोगाध्याय में, क्योंकि पीड़ा, वर्ण, समुत्थान (उत्पत्ति के कारण) आदि अनगिनत हैं।

च. वि. ६/४

, । , , । । , । ; , । , ॥ ४ ॥

और भिन्न-भिन्न भेद-प्रकृतियों (विभाजन के आधारों) पर टिके गिनती के योगों में विरोध है, (केवल) इस कारण यहाँ कोई प्रतिज्ञा (स्थापित कथन) दोषयुक्त नहीं होगी, और न विरोध न होने के कारण (वह) निर्दोष होगी। क्योंकि भेद करने वाला भेद्य (बाँटी जाने वाली वस्तु) को एक ढंग से बाँटता है, और पहले बँटी हुई (उसी वस्तु) को दूसरी भेद-प्रकृति से दूसरे ढंग से बाँटता हुआ अनेक प्रकार से भेदों की अलग-अलग संख्या उत्पन्न करता है, और पहले (वाले) भेदों के योग को नष्ट नहीं करता। भेद-प्रकृति समान होने पर भी निश्चय ही प्रकृत (चल रहे विषय) में प्रयोग के अन्तर को देखना चाहिए। क्योंकि ऐसे भिन्न-भिन्न अर्थ (वस्तुएँ) हैं जो एक ही शब्द से कहे जाते हैं, और ऐसे अभिन्न अर्थ भी हैं जो पर्याय शब्दों से कहे जाते हैं। क्योंकि रोग शब्द दोषों में भी और व्याधियों में भी समान है; दोष भी निश्चय ही रोग शब्द, आतङ्क शब्द, यक्ष्म शब्द, दोषप्रकृति शब्द और विकार शब्द पाते हैं, और व्याधियाँ (भी) रोग शब्द, आतङ्क शब्द, यक्ष्म शब्द, दोषप्रकृति शब्द और विकार शब्द पाती हैं। इनमें रोग शब्द दोषों में भी और व्याधियों में भी समान है, परन्तु शेष (प्रसंगों) में (वह) विशेष (अर्थ) वाला है।

च. वि. ६/५

, ; , । , । । । । । ॥ ५ ॥

उनमें व्याधियाँ अपरिसंख्येय (गिनी न जा सकने वाली) होती हैं, बहुत अधिक होने के कारण; परन्तु दोष तो परिसंख्येय (गिने जा सकने वाले) होते हैं, बहुत अधिक न होने के कारण। इसलिए हम विकारों की उदाहरण के लिए यथाचित्र (विविधता के अनुसार, कुछ चुनकर), और दोषों की बिना कुछ छोड़े, व्याख्या करेंगे। रज और तम दो मानस (मन के) दोष हैं। उन दोनों के विकार काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, मान, मद, शोक, चित्त का उद्वेग, भय, हर्ष आदि हैं। और वात, पित्त और श्लेष्मा (कफ) तो शारीर (शरीर के) दोष हैं। और उनके भी विकार ज्वर, अतीसार, शोफ, शोष, श्वास, मेह, कुष्ठ आदि हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण दोषों की, और विकारों के एक अंश की, व्याख्या की गई।

च. वि. ६/६

; , , ॥ ६ ॥

इस विषय में, इन दोनों ही (प्रकार के) दोषों का प्रकोपण (प्रकोप का कारण) निश्चय ही तीन प्रकार का है; वह इस प्रकार: असात्म्येन्द्रियार्थसंयोग (इन्द्रियों का अपने अर्थों से असात्म्य संयोग), प्रज्ञापराध और परिणाम।

च. वि. ६/७

॥ ७ ॥

और कुपित हुए वे (दोष) निश्चय ही प्रकोपण की विशेषता (भिन्नता) से और दूष्य की विशेषता से अपरिसंख्येय (अगणित) विशेष-विशेष विकारों को उत्पन्न करते हैं।

च. वि. ६/८

॥ ८ ॥

और वे विकार, काम आदि और ज्वर आदि, एक-दूसरे का अनुसरण करते हुए कभी-कभी (एक-दूसरे से) अनुबन्ध करते हैं (जुड़ जाते हैं)।

च. वि. ६/९

, ॥ ९ ॥

परन्तु रज और तम का आपस में अनुबन्ध (जुड़ाव) नियत (सदा रहने वाला) है, क्योंकि रज के बिना तम प्रवृत्त नहीं होता।

च. वि. ६/१०

() ; ॥ १० ॥

(प्रायः) एक ही अधिष्ठान (आश्रय) वाले शारीर दोषों का सन्निपात या संसर्ग (होता है), समान गुण होने के कारण; क्योंकि दोष दूषणों में (दूषित करने में) समान हैं।

च. वि. ६/११

, । , । । ॥ ११ ॥

उनमें अनुबन्ध्य (प्रधान) और अनुबन्ध (उसके पीछे लगा हुआ, अप्रधान) से किया गया भेद (यह है): अनुबन्ध्य स्वतन्त्र होता है, उसके लक्षण स्पष्ट होते हैं, और उसकी उत्पत्ति और शान्ति वैसी ही होती है जैसी (उसके लिए) कही गई है; परन्तु अनुबन्ध के लक्षण उससे उलटे होते हैं। वहाँ यदि दोष अनुबन्ध्य के लक्षणों से युक्त हों, तो उस त्रिक (तीन के समूह) को सन्निपात कहते हैं, या (ऐसे दो दोषों के) द्वय (जोड़े) को संसर्ग (कहते हैं)। परन्तु अनुबन्ध्य और अनुबन्ध के भेद से किया गया दोषों का विभाजन अनेक प्रकार का होता है। इस प्रकार दोषों और व्याधियों में अनेक प्रकृतियों (विभाजन के आधारों) के अनुसार किए गए भेदों का, वैद्यों का यह व्यूह (क्रमबद्ध विन्यास) संज्ञाओं (नामों) से सम्बन्धित है।

च. वि. ६/१२

।, , , । , , , । । , , , ॥ १२ ॥

शरीर की अग्नियों में तो बल के भेद से चार प्रकार का भेद होता है। वह इस प्रकार है: तीक्ष्ण, मन्द, सम और विषम। उनमें तीक्ष्ण अग्नि सब अपचारों (खान-पान और रहन-सहन की भूलों) को सह लेती है; परन्तु मन्द (अग्नि) के लक्षण उससे उलटे होते हैं; सम (अग्नि) तो अपचार से निश्चय ही विकृति को प्राप्त होती है, परन्तु अपचार न होने पर प्रकृति (स्वाभाविक अवस्था) में बनी रहती है; और विषम (अग्नि) के लक्षण सम (अग्नि) के लक्षणों से उलटे होते हैं। ये चार प्रकार की अग्नियाँ चार प्रकार के पुरुषों (मनुष्यों) में ही होती हैं। उनमें जिनके वात, पित्त और श्लेष्मा (कफ) सम हैं और जो प्रकृति में स्थित (स्वस्थ) हैं, उनकी अग्नियाँ सम होती हैं; परन्तु वातल (वात की अधिकता वाले) लोगों की अग्नियाँ, अग्नि के स्थान के वात से दबे होने पर, विषम होती हैं; पित्तल (पित्त की अधिकता वाले) लोगों की अग्नियाँ, अग्नि के स्थान के पित्त से दबे होने पर, तीक्ष्ण होती हैं; और श्लेष्मल (श्लेष्मा की अधिकता वाले) लोगों की अग्नियाँ, अग्नि के स्थान के श्लेष्मा से दबे होने पर, मन्द होती हैं।

च. वि. ६/१३

, ; , , ।, ? , , , , ; । , , ; , ॥ १३ ॥

इस विषय में कुछ (लोग) कहते हैं कि सम वात, पित्त और श्लेष्मा वाले प्राणी नहीं होते, क्योंकि मनुष्य विषम (असन्तुलित) आहार का सेवन करने वाले होते हैं; और इसलिए कुछ (मनुष्य) वात-प्रकृति वाले, कुछ पित्त-प्रकृति वाले और कुछ श्लेष्म-प्रकृति वाले होते हैं। यह (मत) युक्तिसंगत नहीं है। किस कारण से? क्योंकि वैद्य सम वात, पित्त और श्लेष्मा वाले (मनुष्य) को अरोग (रोगरहित) मानते हैं; क्योंकि प्रकृति आरोग्य है, और भेषज-प्रवृत्ति (चिकित्सा का प्रयत्न) आरोग्य के लिए होती है, और वह इष्ट रूप वाली (वांछित) है; इसलिए सम वात, पित्त और श्लेष्मा वाले (मनुष्य) होते हैं; वात-प्रकृति, पित्त-प्रकृति या श्लेष्म-प्रकृति वाले (मनुष्य) निश्चय ही नहीं होते। मनुष्यों की वह-वह दोष-प्रकृति तो उस-उस दोष की अधिकता से कही जाती है, और दोषों के विकृत होने पर प्रकृतिस्थ होना (स्वाभाविक अवस्था में रहना) सम्भव नहीं; इसलिए ये प्रकृतियाँ नहीं हैं। परन्तु वातल, पित्तल और श्लेष्मल (मनुष्य) निश्चय ही होते हैं, पर उन्हें अप्रकृतिस्थ (स्वाभाविक अवस्था में न रहने वाले) जानना चाहिए।

च. वि. ६/१४

। , , ; । ॥ १४ ॥

उन चार प्रकार के पुरुषों के लिए तो चार अनुप्रणिधान (अनुरूप व्यवस्थाएँ) हितकर होते हैं। उनमें, जिनकी सब धातुएँ सम हैं उनके लिए सब प्रकार से सम (अनुप्रणिधान); परन्तु अधिक दोष वाले तीनों के लिए, अपने-अपने दोष की अधिकता को भली-भाँति देखकर, दोष के विपरीत प्रयोग वाले तीन अनुप्रणिधान हितकर होते हैं, जब तक अग्नि सम न हो जाए; (अग्नि के) सम होने पर तो सम (अनुप्रणिधान) ही करना चाहिए; इसी प्रकार चेष्टा (आचरण) और अन्य भेषज-प्रयोग भी (होने चाहिए)। उनकी हम आगे विस्तार से व्याख्या करेंगे।

च. वि. ६/१५

, ।, , । , , ॥ १५ ॥

परन्तु तीन (प्रकार के) पुरुष आतुर (रोगी) होते हैं; वे तो दूसरे तन्त्रों (शास्त्रों) के वैद्यों के (मत में) अनातुर (रोगी नहीं) हैं। वे इस प्रकार हैं: वातल, पित्तल और श्लेष्मल। उनकी यह विशेष पहचान है: वातल को वात के कारण होने वाले, पित्तल को पित्त के कारण होने वाले और श्लेष्मल को श्लेष्मा के कारण होने वाले रोग प्रायः होते हैं, और बलवान् (प्रबल) होते हैं।

च. वि. ६/१६

, ; । , , , , , , , ॥ १६ ॥

उनमें से, वातल (वात की अधिकता वाले) व्यक्ति जब वात को कुपित करने वाली चीज़ों का सेवन करता रहता है, तो उसका वात शीघ्र प्रकोप को प्राप्त होता है, अन्य दो दोष वैसे (शीघ्र कुपित) नहीं होते; कुपित हुआ वह (वात) उस (व्यक्ति) के शरीर को पहले कहे गए विकारों से पीड़ित करता है, जिससे (उसके) बल, वर्ण, सुख और आयु की हानि होती है। उस (वात) के अवजयन (उसे जीतने) के उपाय ये हैं - विधि के अनुसार किए गए स्नेह और स्वेद; स्नेह, उष्ण, मधुर, अम्ल और लवण से युक्त मृदु संशोधन; वैसे ही खाने-पीने के पदार्थ; अभ्यङ्ग, उपनाहन, उद्वेष्टन, उन्मर्दन, परिषेक, अवगाहन, संवाहन, अवपीडन, वित्रासन (डराना), विस्मापन (विस्मित करना) और विस्मारण (भुलवाना); सुरा और आसव का विधिपूर्वक प्रयोग; अनेक योनियों (स्रोतों) से प्राप्त और दीपनीय, पाचनीय, वातहर और विरेचनीय (द्रव्यों) से युक्त स्नेह, तथा शतपाक और सहस्रपाक (स्नेह), जो सब प्रकार से प्रयोग के लिए हों; बस्तियाँ; बस्ति सम्बन्धी नियम; और सुखशीलता (सुख से रहने का स्वभाव)।

च. वि. ६/१७

, ; ।, , , , , , , , , , , , , , , ॥ १७ ॥

पित्तल (मनुष्य) का भी, पित्त को प्रकुपित करने वाले (आहार-विहार) का सेवन करते रहने पर, पित्त शीघ्र प्रकोप को प्राप्त होता है, दूसरे दो दोष वैसे नहीं; प्रकोप को प्राप्त हुआ इसका वह (पित्त) पहले कहे गए विकारों से शरीर को पीड़ित करता है, बल, वर्ण, सुख और आयु के उपघात (हानि) के लिए। उसका अवजयन (उसे जीतने का उपाय यह है): सर्पि (घी) पीना, और सर्पि से स्नेहन, और नीचे (के मार्ग) से दोष को निकालना, और मधुर, तिक्त, कषाय और शीत औषधों और खाद्य पदार्थों का उपयोग, और कोमल, मधुर, सुगन्धित, शीतल और हृद्य (मन को प्रिय) गन्धों का सेवन, और अत्यन्त शीतल जल में रखी गई मोतियों और मणियों की मालाओं को छाती पर धारण करना, क्षण-क्षण में उत्तम चन्दन, प्रियङ्गु, कालीय और मृणाल (कमल-नाल) से शीतल की गई वायु और जल से, और उत्पल, कुमुद, कोकनद, सौगन्धिक और पद्म (के फूलों) से युक्त जल से अभिप्रोक्षण (छिड़काव), और कानों को सुख देने वाले, कोमल, मधुर और मन को भाने वाले गीतों और वाद्यों का श्रवण, और अभ्युदयों (शुभ समाचारों) का श्रवण, मित्रों के साथ संयोग (मिलना), और शीतल किए गए वस्त्र और मालाएँ धारण करने वाली प्रिय स्त्रियों के साथ संयोग, चन्द्रमा की किरणों से शीतल और हवादार हर्म्य (महल) में निवास, पर्वतों के बीच के स्थानों, पुलिन (नदी के रेतीले तटों), शीतल भवनों, वस्त्रों और पंखे की हवा का सेवन, और सुखद, शीतल, सुगन्धित वायु से युक्त रमणीय उपवनों (बगीचों) का सेवन, और पद्म, उत्पल, नलिन, कुमुद, सौगन्धिक, पुण्डरीक और शतपत्र (के फूलों) के गुच्छों का सेवन, और सब सौम्य (शीतल और शान्त करने वाले) भावों का (सेवन)।

च. वि. ६/१८

, ; । , , , , , , ॥ १८ ॥

श्लेष्मल (मनुष्य) के भी, श्लेष्मा को प्रकुपित करने वाली (वस्तुओं) का सेवन करते रहने पर, श्लेष्मा शीघ्र ही प्रकोप को प्राप्त होता है, दूसरे दो दोष वैसे नहीं; प्रकोप को प्राप्त हुआ उसका वह (श्लेष्मा) पहले कहे गए विकारों से शरीर को पीड़ित करता है, जिससे बल, वर्ण, सुख और आयु का उपघात (हानि) होता है। उसका अवजयन (जीतने का उपाय) यह है: विधि के अनुसार किए गए तीक्ष्ण और उष्ण संशोधन, और प्रायः रूक्ष तथा कटु, तिक्त और कषाय (रसों) से युक्त आहार; इसी प्रकार दौड़ना, लङ्घन (लाँघना, कूदना), प्लवन (तैरना), घूमना-फिरना, जागना, नियुद्ध (कुश्ती), व्यवाय (मैथुन), व्यायाम, उन्मर्दन (दबाकर मलना), स्नान और उत्सादन (उबटन); विशेष रूप से तीक्ष्ण और लम्बे समय तक रखे हुए (पुराने) मद्यों का उपयोग; धूमपान सहित और सब प्रकार से उपवास; इसी प्रकार गर्म वस्त्र; और सुख के लिए ही सुख का प्रतिषेध (त्याग)।

च. वि. ६/१९

- । ॥ १९ ॥

और इस विषय में (यह श्लोक) है: जो सब रोगों के विशेष (भेद) जानता है, सब कार्यों के विशेष जानता है और सब भेषजों (औषधों) का तत्त्व जानता है, (वह) राजा का प्राणपति (प्राणों का रक्षक) होना चाहिए।

च. वि. ६/२०

- । ॥ २० ॥

इस विषय में (संग्रह के) श्लोक (ये हैं): अलग-अलग आधारों पर किए गए भेद से रोगानीक (रोगों के वर्गों) का विकल्पन (वर्गीकरण), और (उनका) परस्पर अविरोध (एक-दूसरे से विरोध न होना), रोग और दोष का सामान्य (समानता),

च. वि. ६/२१

। ॥ २१ ॥

दोषों की संख्या, विकारों का एकदेश (एक अंश), प्रकोपण (दोषों को प्रकुपित करने वाले कारण), और जरण (पाचन) के विषय में चिन्ता (विचार), और कायाग्नि (शरीर की अग्नि) के धुक्षण (उसे प्रदीप्त करने के उपाय),

च. वि. ६/२२

। ॥ २२ ॥

और वातल आदि मनुष्यों के प्रकृतिस्थापन (उन्हें प्रकृति में स्थापित करने के उपाय), (ये सब) इस रोगानीक विमान में महर्षि ने कहे हैं।

च. वि. ६

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र (ग्रन्थ) के विमानस्थान में रोगानीकविमान नामक छठा अध्याय (पूरा हुआ)।