व्याख्या
यह सूत्र पित्तल मनुष्य के लिए वही बताता है जो वि. ६/१६ ने वातल के लिए बताया था। पित्त शरीर के तीन दोषों (वात, पित्त और कफ) में से एक है; दोष शरीर की क्रियाएँ चलाते हैं और बिगड़ने पर रोग उत्पन्न करते हैं। पित्तल वह मनुष्य है जिसमें पित्त अधिक रहता है (वि. ६/१५)। सूत्र कहता है कि ऐसा मनुष्य जब पित्त को बढ़ाने वाले आहार-विहार का सेवन करता है, तो उसका पित्त शीघ्र प्रकुपित हो जाता है; प्रकोप का अर्थ है दोष का बढ़कर उत्तेजित और विकृत हो जाना। बाकी दो दोष, वात और कफ, उसमें उतनी जल्दी नहीं बिगड़ते। प्रकुपित पित्त 'यथोक्त', अर्थात् पहले बताए गए, विकारों (रोगों) से शरीर को पीड़ित करता है, और इससे बल, वर्ण (शरीर का रंग और कान्ति), सुख और आयु की हानि होती है; ये विकार कौन से हैं, यह सूत्र यहाँ नहीं गिनाता। इसके बाद पित्त का अवजयन बताया गया है। अवजयन का अर्थ है जीतना, यानी बढ़े हुए पित्त को वश में करने के उपाय। वि. ६/१४ में कहा गया था कि अधिक दोष वाले के लिए उस दोष के विपरीत व्यवस्था हितकर है; चरक संहिता (सू. १/६०) पित्त को उष्ण (गरम) गुण वाला बताती है, और यहाँ गिनाए गए उपाय लगभग सब शीतल, मधुर या मन को शान्त करने वाले हैं। पहले शरीर से जुड़े उपाय हैं: सर्पि (घी) पीना; घी से स्नेहन, यानी शरीर को स्निग्ध (चिकना) करना; नीचे के मार्ग से दोष को बाहर निकालना, जिसे विरेचन कहते हैं; और मधुर (मीठे), तिक्त (कड़वे), कषाय (कसैले) तथा शीत (ठंडे) औषधों और खाद्य पदार्थों का उपयोग। फिर इन्द्रियों और मन को सुख देने वाले उपाय आते हैं: कोमल, मधुर, शीतल और हृद्य (मन को प्रिय) सुगन्ध; बहुत ठंडे जल में रखी मोतियों और मणियों की मालाएँ छाती पर पहनना; उत्तम चन्दन, प्रियङ्गु, कालीय और मृणाल (कमल-नाल) से शीतल की गई वायु और जल से, और कमल-जाति के फूलों वाले जल से, बार-बार छिड़काव (अभिप्रोक्षण); कानों को सुख देने वाले, कोमल और मधुर गीत और वाद्य सुनना; अभ्युदय, यानी उन्नति और शुभ घटनाओं, की बातें सुनना; मित्रों का साथ, और शीतल किए गए वस्त्र और मालाएँ पहनी हुई प्रिय स्त्रियों का साथ; चाँदनी से शीतल, हवादार हर्म्य (महल) में रहना; पर्वतों के बीच के स्थान, पुलिन (नदी के रेतीले तट), ठंडे भवन, वस्त्र और पंखे की हवा; ठंडी और सुगन्धित हवा वाले सुन्दर उपवन (बगीचे); कमल के अनेक प्रकार के फूलों के गुच्छे; और अन्त में सब सौम्य भाव, अर्थात् वे सब चीज़ें जो शीतल और शान्त करने वाली हों। प्रियङ्गु और कालीय वनस्पतियों के नाम हैं, जिनकी पहचान यहाँ नहीं दी गई; उत्पल, कुमुद, कोकनद, सौगन्धिक, पद्म, नलिन, पुण्डरीक और शतपत्र कमल और उससे मिलते-जुलते जल-पुष्पों के नाम हैं, और इनकी अलग-अलग पहचान भी यहाँ नहीं की गई। कुछ स्थानों का अर्थ पूरी तरह स्पष्ट नहीं है: 'शीतवातवारिभिः' को यहाँ 'शीतल की गई वायु और जल' माना गया है, पर इसका अर्थ 'वायु से ठंडा किया गया जल' भी हो सकता है; 'शैलान्तरपुलिन' से आरम्भ होने वाले समास में 'वसन' का अर्थ वस्त्र लिया गया है, जो 'रहना' भी हो सकता है; और कमलों के नामों के बाद आए 'हस्त' का अर्थ सम्भवतः हाथ भर फूल या गुच्छा है। (मूल में 'चैषधाभ्यवहार्याणाम्' छपा है; यह 'चौषधाभ्यवहार्याणाम्' ('च' और 'औषध' की सन्धि) की टंकण-भूल है, और अनुवाद 'औषध' मानकर किया गया है।)